माननीय बाबूलाल मरांडी जी की बहुत ही अच्छी पहल उन्होंने सरकार से किया मायका उद्योग का पुराना जीवित करने की मांग।


माननीय बाबूलाल मरांडी जी की बहुत ही अच्छी पहल उन्होंने सरकार से किया मायका उद्योग का पुराना जीवित करने की मांग।




माइका 50 हजार लोगों को मिलेगा प्रत्यक्ष रोजगार


 झारखंड सरकार के पास अच्छा मौका है अपने राज्य को विकसित करने का जिससे यहां के लोगों को अपने राज्य में ही रोजगार मिल सके हमारा झारखंड दिल्ली मुंबई से भी आगे हैं यहां पर अधिकांश माइका माइंस कोयला माइंस के अलावा और भी कई प्रकार के रोजगार के साधन है मैं इस राज्य का नागरिक होने के नाते सरकार से मांग करता हूं यहां के लोगों को अपने ही राज्य में है रोजगार उपलब्ध कराया जाए ताकि यहां के लोगों को दूसरे प्रदेशों पर रोजगार के लिए जाना ना पड़े.


#रांची । गिरिडीह और कोडरमा जिले में फैले अबरख (माइका) के भंडार पर पूरी दुनिया रश्क करती थी । इस माइका उद्योग से दोनों जिलों के लाखों लोगों को रोजगार मिलता था । वक्त के साथ माइका उद्योग पर संकट के बादल मंडराने लगे । माइका उद्योग बंद होने से लाखों लोग बेरोजगार हुए । बेरोजगारी की वजह से पलायन बढ़ा और दोनों जिलों की रौनक ही चली गई ।
माइका उद्योग को पुनर्जीवित करने का मौका
सीएम हेमंत सोरेन को लिखे पत्र में #बाबूलाल_मरांडी ने कहा कि लॉकडाउन के कारण गिरिडीह और कोडरमा जिलेके हजारों लोग वापस अपने घर लौट आए हैं । इतने लोगों को सिर्फ पौधारोपण और मनरेगा से रोजगार नहीं दिया जा सकता । अगर सरकार थोड़ा आर्थिक पैकेज देकर माइका उद्योग को पुनर्जीवित कर दे तो हजारों प्रवासी मजदूरों को अपने घर पर ही परमानेन्ट रोजगार मिल जाएगा ।
#सरकार को होगी राजस्व की प्राप्ति
बाबूलाल_मरांडी ने कहा कि जहां जो संपदा होती है, स्वाभाविक रूप से लोगों की निर्भरता उस पर होती है। 1980 के पूर्व यहां सैकड़ों माइंस संचालित हुआ करती थी। जिससे लाखों लोगों को रोजगार प्राप्त होता था। अब कतिपय कारणों से जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़े इस व्यवसाय को पुनर्जीवित कर इस जिले में पुनः लाखों लोगों को रोजगार मुहैया कराया जा सकता है। साथ ही इससे काफी राजस्व की भी प्राप्ति की जा सकती है। कोरोना संकट से उपजे हालात के बीच इसे पुर्नजीवित करना इस इलाके के लिए वरदान साबित हो सकता है।
#अबरख_को_केन्द्र_सरकार_ने_लघु_खनिज_माना
बाबूलाल_मरांडी ने कहा कि खनिज संपदा के उत्खनन, प्रसंस्करण एवं उसके निर्यात को बढ़ावा देने के लिए वर्ष-2015 में 31 प्रकार के वृहद खनिजों को भारत सरकार द्वारा लघु खजिन की श्रेणी में शामिल किया गया था। जिसमें एक माईका भी है। अगर हेमंत सोरेन की सरकार माइका उद्योग के लिए नीति बनाकर 6 इंच से छोटे माईका/ढिबरा चुनने, भंडारण और उसके परिवहन पर वन विभाग व पुलिसिया कार्रवाई पर रोक लगाने की पहल करे तो सरकार को राजस्व की प्राप्ति होगी और हजारों लोगों को रोजगार भी मिलेगा ।

बाबूलाल_मरांडी ने कहा कि वन विभाग या उससे बाहर ढिबरा चुनने वाले गरीबों को ढिबरा पिकर का नाम और काम देकर स्वनियोजन का अधिकार देने की जरूरत है। इन ढिबरा पिकर से तय दर पर ग्राम पंचायत ढिबरा खरीदे और उसे संबंधित विभाग की बेबसाइड पर अपलोड कर दे। समुचित मात्रा में ढिबरा एकत्रित होने के उपरांत विभाग द्वारा तय दर या नीलामी से माईका व्यवसायी को बेचकर ग्राम पंचायत को उसकी कीमत का भुगतान तत्काल सुनिश्चित करनी चाहिए।

इसके आगे की भी माईका व्यवसायियों के उनके व्यवसायिक गंतव्य तक बिना व्यवधान के परिवहन की पारदर्शी व्यवस्था सरकार को तय करनी चाहिए। रैयती और गैरमजरूआ जमीन पर तो खनन पट्टा/अधिकार मिले ही। साथ ही वैसे वन भूमि जो केवल नाम के वन रह गये हैं, उन्हें वनभूमि के दायरे से बाहर कर वहां भी खनन पट्टा देकर इस रोजगार को व्यापक बनाने की जरूरत है।
50_हजार_लोगों_को_मिलेगा_प्रत्यक्ष_रोजगार

लगभग 50 माईका के माइंस चालू होने से 50 हजार से अधिक कुशल, अकुशल और अर्धकुशल मजदूरों का नियोजन हो सकता है। साथ ही शीट माईका एवं अन्य माईका के प्रसंस्करण से 2 लाख मजदूरों का नियोजन किया जा सकता है । इससे राज्य में जहां हजारों करोड़ रूपये के निवेश की संभावना होगी वहीं इस संकट काल में प्रवासी मजदूरों को अपने राज्य, अपने घर में रोजगार मिलेगा ।

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