ई-नाम कैसे बना किसानों के लिए वरदान

ई-नाम कैसे बना किसानों के लिए वरदान


. राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-NAM) स्कीम के शुरू हुए मंगलवार को 4 साल पूरे हो गए. मोदी सरकार ने ई-नाम योजना को किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए शुरू किया था. यह ऑनलाइन मंडी किसानों और कृषि कारोबारियों इतनी हिट है कि साल 2017 तक जिस ई-मंडी से सिर्फ 17 हजार लोग जुड़े थे उससे अब 1.68 करोड़ किसान, व्यापारी और एफपीओ (Farmer Producer Organisation) रजिस्टर्ड हो चुके हैं.

यह एक इलेक्ट्रॉनिक कृषि पोर्टल है, 
ई-नाम कैसे बना किसानों के लिए वरदान जो पूरे भारत में मौजूद एग्री प्रोडक्ट मार्केटिंग कमेटी को एक नेटवर्क में जोड़ने का काम करती है. इसका मकसद एग्रीकल्चर प्रोडक्ट के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक बाजार उपलब्ध करवाना है. जिससे कृषि उत्‍पादों का अधिक दाम मिलेगा. किसान घर बैठे ई-मंडियों में अपना सामान बेच सकते हैं.

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का कहना है कि ई-नाम कृषि कारोबार में एक अनूठी पहल है, जो किसानों की डिजिटल पहुंच को कई बाजारों और खरीदारों तक डिजिटल रूप से पहुंचाता है. कीमत में सुधार और लेनदेन में पारदर्शिता लाता है. गुणवत्ता के अनुसार कीमत और कृषि उपज के लिए हम अब "एक राष्ट्र-एक बाजार" की ओर बढ़ रहे हैं. जल्द ही ई-मंडियों की संख्या 1000 हो जाएगी.

e-NAM क्यों और कब शुरु हुई

किसानों के लिए कृषि उत्पादों की मार्केटिंग को आसान बनाने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, 14 अप्रैल 2016 को 21 मंडियों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस स्कीम की शुरूआत की थी. इस समय इस बाजार से 18 राज्यों के 1,66,06,718 किसान, 977 एफपीओ, 70,910 कमीशन एजेंट और 1,28,015 व्यापारी जुड़े हुए हैं.
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हजारीबाग. लाॅकडाउन में यहां किसान अपनी उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिलने से परेशान हैं. ऐसे में भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रारंभ ई-नाम किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है.  ई-नाम के माध्यम से किसानों के तरबूज फसल का अच्छा मूल्य मिल रहा है. साथ ही बिक्री के बाद किसानों को उसके पैसे भी उनके खाते में 24 घंटे से 48 घंटे के अंदर मिल जा रहा है. बुधवार को चुरचू प्रखंड के चनारो के प्रगतिशील किसान फुलेश्वर महतो ने फारमर्स प्रोड्यूसर्स समूह बनाकर अपने खेत में लगे तरबूज का ई-नाम के माध्यम से बिडिंग कर व्यापारियों के हाथ बेचा.
बिडिंग के क्रम में गढ़वा एवं कोडरमा बाजार समिति से जुड़े व्यापारी ने तरबूज की खरीदारी की. साथ ही स्थानीय व्यापारी द्वारा भी इसकी खरीदारी की गई. फुलेश्वर महतो ने बताया कि आम तौर पर जहां तरबूज बाजार में पांच रुपये से दस रुपये प्रति किलो पहुंचाकर बेचने की मजबूरी है. वहीं ई-नाम के माध्यम से उसे दस रुपये से ग्यारह रुपये प्रति किलो का मूल्य उसके खेत में ही मिल रहा है. ऐसे में ई-नाम किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है. 
कृषि उत्पादन बाजार समिति के सचिव राकेश कुमार सिंह ने बताया कि ई-नाम किसानों के लिए लाॅकडाउन में भी काफी कारगर साबित हो रहा है.  उन्होंने कहा कि जल्द हीं ई-नाम के माध्यम से इचाक के किसानों के धनिया पत्ता उत्पाद को बाजार में बेचा जाएगा. इस दिशा में पहल की जा रही है. उन्होंने किसानों से ई-नाम से जुड़ने की अपील की.

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