organic manure , कार्बनिक खाद बनाने की विधि एवं कार्बनिक खाद कितने प्रकार की होती है ।

 कार्बनिक खाद बनाने की विधि एवं कार्बनिक खाद कितने प्रकार की होती है ( What is organic manure , how to make organic manure and what are the types of organic manure )

 कार्बनिक खाद क्या है ( What is Organic Manure . ) कार्बनिक खेती एक स्थाई खेती है । इसमें परम्परागत खेती की विधियों को अपनाकर विभिन्न रसायनों के दुष्प्रभाव से भूमि , पर्यावरण व कृषि उत्पाद को बचाया जा सकता है । कार्बनिक खादों के प्रयोग से भूमि अवस्था में सुधार होता है जिससे भूमि में वायु संचार ( aeration ) में वृद्धि होती है , जीवांश पदार्थ का निर्माण होता है । वायुमण्डल की नाइट्रोजन का पौधों में स्थिरीकरण बट जाता है और इनके फलस्वरूप उत्पाद में वृद्धि होती है । कार्बनिक खाद कितने प्रकार की होती है ( What is the type of organic manure ) इन खादों के क्षय व अपघटन के फलस्वरूप पौधों को पोषक तत्वों की आपूर्ति होती है । । इन खादों का संक्षिप्त निम्न प्रकार है
1 . गोबर की खाद ( Farm Yard Manure ) , 
2 . कम्पोस्ट ( Compost )
 3 . वर्मी कम्पोस्ट ( Verni compost ) . 
4 . हरी खाद ( Green Manure ) ,
 5 . जैविक खाडे ( Biotic Manures ) प्रमुख हैं ।
 कार्बनिक खाद बनाने की विधियां ( Methods of making organic manure) कार्बनिक खेती में बहुत सी खादों का प्रयोग किया जाता है ।
 1 . गोबर की खाद ( Farm yard Manure )

गोबर खाद तैयार करने की नई विधि : गोबर के ढेर या कुरड़ी को सभी तरफ के किनारों को लगभग आधा या एक फुट ऊंचा उठाकर प्यालीनुमा बना लेते हैं। इसके बाद इसमें बाल्टियों या पाइप से इतनी मात्रा में पानी डाला जाता है कि सारा गोबर का ढेर ऊपर से नीचे तक गीला हो जाए। पानी से गच करने के लिए ढेर में जगह-जगह लकड़ी या सरिया से छेद बना देते हैं। इसके बाद इस ढेर पर सिर्फ काले रंग की पालीथीन या मोमजामा की शीट से पूरी तरह ढक दिया जाता है। इस दौरान सावधानी रखी जाए कि पालीथीन कटे या फटे नहीं और आवारा पशु ढेर पर न चढ़ सकें। थोड़े से समय में ही अच्छी खाद तैयार हो जाती है


2 . कम्पोस्ट ( Compost )

अच्छी तरह सड़े हुए पौधों और पशु अवशेषों को कम्पोस्ट खाद कहा जाता है| कम्पोस्ट (Compost) खाद का मतलब है, की खेतो में प्रयोग से पहले उसको अच्छी तरह सड़ा लेना चाहिए, कम्पोस्ट (Compost) की अवश्यक आवश्यकताओं में हवा, नमी, अनुकूल तापमान और नाइट्रोजन की एक छोटी मात्रा है| यह सूक्ष्मजीवों का एक क्रिया कलाप है और वही सामग्री को कमजोर करने के लिए सूक्ष्म जीवों को पेश करने के लिए उपयुक्त तैयार इनोकुल्मो को जोड़ने की सिफारिस करते है|
कम्पोस्ट (Compost) खाद फसक व पौधों के पोषक तत्वों में उच्च जैविक उर्वरता संचार करता है, जो मिट्टी की भौतिक विशेषताओं में सुधार करता है, खेत में जैव अपशिष्ट को कम करता है और रोगजनकियों को खत्म करता है| इस तरह कम्पोस्ट (Compost) खाद जैविक खेती का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
कम्पोस्ट खाद कैसे काम करता है (how Compost Fertilizer works) 
1. कम्पोस्ट (Compost) खाद प्रभावी तब होता है, जब आप एसी परिस्थिति बनाते है, जो सूक्ष्म जीवों के नाम पर मिट्टी में छोटे छोटे जीवों के विकास का समर्थन करते है| ये वैक्टैरिया और कवक है, इनको केवल एक सूक्ष्मदंशक का उपयोग कर के देखा जा सकता है|
2. इन सूक्ष्म जीवों को पौधे और पशु अपशिष्ट पदार्थो को तोड़ने के लिए आवश्यक है| वे पौधे और पशु के कचरे के टूटने के दोरान गर्मी का उत्पादन करते है|
3. कुछ दिनों के बाद, तैयार कम्पोस्ट ढेर गर्म हो जाएगा और जब उसको खोला जाएगा तो भाप भी दिखाई दे सकती है| कचरे की सामग्री के रूप में विघटित होने पर वे ऐसे पदार्थो में पोषक तत्वों को छोड़ते है, जिनका उपयोग फसल और पौधों में किया जा सकता है|
कम्पोस्ट खाद की प्रक्रिया (Compost Manure Process)
1. फसल के अवशेषों, पशु और घरेलू कार्बनिक अपशिष्ट को गड्ढे में डाल दिया जाता है| उसको उचित नमी के साथ 4 से 5 महीने तक विघटित होने के लिए छोड़ दिया जाता है| इसके बाद आप देखेंगे की फसल में उपयोग के लिए खाद तैयार है|
2. अपशिष्ट पदार्थो को छाया के निचे ढक कर छोड़ दिया जाता है और उपरोक्त तरीके से विघटित होने के लिए छोड़ दिया जाता है| दोनों तरीकों से खाद का उत्पादन होता है, लेकिन इस प्रक्रिया में आप देखेगे की खाद में पोषक तत्वों की गुणवत्ता कम है|
3. हालाँकि प्रयोजनपूर्ण तरीकों से उच्च गुणवत्ता वाले खाद का करने के लिए नियोजित किया जा सकता है| जो किसानों को महंगा अकार्बनिक उर्वरक का उपयोग किए बिना फसल की पैदावार में वृद्धि कर सकती है| इस प्रकार की खाद को समृद्ध खाद कहा जाता है|
कम्पोस्ट खाद के लिए आवश्यक (Recruited for Compost Manure)
1. कम्पोस्ट के लिए उस स्थान का चयन करे जहा हवा, धुप और पानी का प्रभाव ज्यादा नही होना चाहिए यानि की संतुलित मात्रा में हो, मिश्रण या कचरा न तो ज्यादा गिला होना चाहिए और ना ही सुखा होना चाहिए|
2. खाद बनाने के लिए जगह का चयन जमीन के उपर या गड्ढे के रूप दोनों तरह से किया जा सकता है, अगर जमीन के उपर कर रहें है तो उस जगह से खरपतवार को साफ करे और मिट्टी की एक कुछ सेंटीमीटर परत बनाए उसको पानी से गीलाकर के उसपर कचरा डाले इसी तरह यदि गड्ढे का उपयोग कर रहें है तो वहा भी मिट्टी की परत बनाए और पानी का छिडकाव करे|
3. कचरा डालने के बाद उसके उपर एक 15 सेंटीमीटर रेत की परत तैयार करनी चाहिए और उसको पूरी तरह से पानी से गिला कर देना चाहिए|
कम्पोस्ट खाद बनाने की प्रक्रिया (Compost Manufacturing Process)
1. इसके लिए एक उचित आकर का गड्ढा बनाए 20 से 25 फुट लम्बा, 5 से 7 फुट चौड़ा और 3 से 10 फिट तक गहरा हो सकता है| यदि आप की पास ज्यादा मिश्रण है तो इसको बड़ा कर सकते है और कम है तो छोटा कर सकते है|
2. यदि हो सके तो अधिक नाइट्रोजन के लिए मिश्रण में पौधों या फसल के अवशेष ज्यादा डाले जिसे नाइट्रोजन की मात्रा ज्यादा मिल सकती है|
3. मिश्रण को डालते समय ध्यान दे की उसमे कोई खाली स्थान नही होना चाहिए अच्छी तरह दबा कर गड्डे को भरे और ऊपर गोबर का लेप करे इसके बाद उसपर 15 सेंटीमीटर मिट्टी की परत बना दे जिसको पानी से गिला कर देना चाहिए|
4. कचरे को नमी युक्त कर के गड्डे में डाले और 4 से 5 महीने के लिए छोड़ दे अब इतने समय के बाद आप देखेगे की कम्पोस्ट (Compost) खाद फसल के आवश्यक पोषक तत्वों के साथ तैयार है|
5. कम्पोस्ट खाद को फसल बुआई से 3 से 4 सप्ताह पहले नमी युक्त खेत में डाले और उसकों किसी भी यंत्र से मिट्टी में अच्छे से मिला दे| ताकि पोषक तत्व भूमि में अच्छे तरीके से प्रगतिशील हो सके और एक बेहतर पैदावार किसान को मिल सके|
कम्पोस्ट खाद के लाभ (Benefit of Compost Manure)
1. यह सस्ता है, क्योंकी यह फसल के अवशेषों, गोबर, घास और अन्य घरेलू कचरे से बनती है|
2. पौधे इसके पोषक तत्वों को अधिक दुटने की बजाय सीधे ग्रहण कर लेते है|
3. इससे फसल की पैदावार में तुरंत प्रभाव पड़ता है|
4. मिट्टी की जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है जिससे फसल को समर्थन मिलता है और पानी की बचत होती है|
5. भूमि की पोषण शक्ति प्रभावित नही होती है|
6. पर्यावरण पर दूषित प्रभाव नही पड़ता यानि की पर्यावरण प्रदुषण से छुटकारा मिलता है|
7. जैविक खादों से बने उत्पादों से स्वास्थ्य प्रभावित नही होता|
इस तरह किसान भाई समज सकते है की कम्पोस्ट (Compost) खाद बनाना कितना सस्ता और आसान है और साथ ही फसल पैदावार, भूमि, मानव जाती के स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए भी कितना उपयोगी और गुणकारी हो 

 3 . वर्मी कम्पोस्ट ( Verni compost ) .

केंचुआ खाद या वर्मीकम्पोस्ट (Vermicompost) पोषण पदार्थों से भरपूर एक उत्तम जैव उर्वरक है। यह केंचुआ आदि कीड़ों के द्वारा वनस्पतियों एवं भोजन के कचरे आदि को विघटित करके बनाई जाती है।
वर्मी कम्पोस्ट में बदबू नहीं होती है और मक्खी एवं मच्छर नहीं बढ़ते है तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता है। तापमान नियंत्रित रहने से जीवाणु क्रियाशील तथा सक्रिय रहते हैं। वर्मी कम्पोस्ट डेढ़ से दो माह के अंदर तैयार हो जाता है। इसमें 2.5 से 3% नाइट्रोजन, 1.5 से 2% सल्फर तथा 1.5 से 2% पोटाश पाया जाता है।
केंचुआ खाद की विशेषताएँ : इस खाद में बदबू नहीं होती है, तथा मक्खी, मच्छर भी नहीं बढ़ते है जिससे वातावरण स्वस्थ रहता है। इससे सूक्ष्म पोषित तत्वों के साथ-साथ नाइट्रोजन 2 से 3 प्रतिशत, फास्फोरस 1 से 2 प्रतिशत, पोटाश 1 से 2 प्रतिशत मिलता है।
  • इस खाद को तैयार करने में प्रक्रिया स्थापित हो जाने के बाद एक से डेढ़ माह का समय लगता है।
  • प्रत्येक माह एक टन खाद प्राप्त करने हेतु 100 वर्गफुट आकार की नर्सरी बेड पर्याप्त होती है।
  • केचुँआ खाद की केवल 2 टन मात्रा प्रति हैक्टेयर आवश्यक है।

4 . हरी खाद ( Green Manure ) 


हरी खाद (Green Manure) को एक शुद्ध फसल के रूप में खेत की उपजाऊ शक्ति, भूमि के पोषक और जैविक पदार्थो की पूर्ति करने के उदेश्य से की जाती है| इस प्रकार की फसलों को हरियाली की ही अवस्था में हल या किसी अन्य यंत्र से उसी खेत की मिट्टी में मिला दिया जाता है| हरी खाद (Green Manure) से भूमि का संरक्षण होता है और खेत की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है| आज कल भूमि में लगातार फसल चक्र से उस खेत में उपस्थित फसल की पैदावार और बढवार के लिए आवश्यक तत्व नष्ट होते जाते है|
इनकी आपूर्ति और पैदावार को बनाए रखने के लिए हरी खाद (Green Manure) एक अच्छा विकल्प हो सकता है| हरी खाद के लिए बनी किस्मे, दलहनी फसले या अन्य फसलों को हरी अवस्था में जब भूमि की नाइट्रोजन और जीवाणु की मात्रा को बढ़ाने के लिए खेत में ही दबा दिया जाता है तो इस प्रक्रिया को हरी खाद (Green Manure) देना कहते है| 

हरी खाद वाली फसलें (Green Manure Crops)

1. हरी खाद (Green Manure) वाली खरीफ की फसलें लोबिया, मुंग, उड़द, ढेचा, सनई व गवार हरी खाद की फसल से अधिकतम कार्बनिक पदार्थ और नाइट्रोजन प्राप्त करने के लिए एक विशेष अवस्था में उसी खेत में दबा देना चाहिए| इन फसलों को 30 से 50 दिन की अवधि में ही पलट देना चाहिए| क्योंकी की इस अवधि में पौधे नरम होते है जल्दी गलते है|
2. हरी खाद के लिए रवि की फसलें बरसीम, सैंजी, मटर और चना आदि फसलों का प्रयोग किया जा सकता है और कम लागत में भूमि के लिए अच्छे कार्बनिक पदार्थ प्राप्त हो सकते है|
3. अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों या जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है उसके लिए सनई और लोबिया को उपयोग में लाना चाहिए और कम वर्षा व जल वाली भूमि के लिए ढेंचा और ग्वार को महत्व देना चाहिए| दलहनी फसलों को उस जगह उपयोग में लाए जहा पानी ना ठरता हो| क्षारीय और समस्याग्रस्त क्षेत्रों के लिए ढेंचा और लोबिया उपयोग में लाना चाहिए|

हरी खाद के लाभ (Benefits of Green Manure) 

1. यह खाद (Green Manure) केवल नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थो की ही आपूर्ति नही करती है बल्कि इससे भूमि को कई पोषक तत्व भी प्राप्त होते है| इसे प्राप्त होने वाले पदार्थ इस प्रकार है नाइट्रोजन, गंधक, स्फुर, पोटाश, मैग्नीशियम, कैल्शियम, तांबा, लोहा और जस्ता इत्यादि|
2. इसके उपयोग से भूमि में सूक्ष्मजीवों की संख्या और क्रियाशीलता बढ़ती है, तथा मिट्टी की उर्वरा शक्ति व उत्पादन क्षमता में भी बढ़ोतरी देखने को मिलती है|
3. हरी खाद के प्रयोग से मिट्टी नरम होती है, हवा का संचार होता है, जल धारण क्षमता में वृद्धि, खट्टापन व लवणता में सुधार तथा मिट्टी क्षय में भी सुधार आता है|
4. भूमि को को इस खाद (Green Manure) से मृदा जनित रोगों से भी छुटकारा मिलता है|
5. किसानों के लिए कम लागत में अधिक फायदा हो सकता है, स्वास्थ और पर्यावरण में भी सुधार होता है|

उपयोग कैसे करे (How to Uses)

1. जिस मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम है वहा हरी खाद (Green Manure) की दलहनी फसल को कम समय में अधिक बढवार के लिए 25 से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन और गैर दलहनी के लिए 45 से 50 किलोग्राम नाइट्रोजन बुआई के समय डालने से काफी लाभ हो सकता है| और उचित नमी के साथ इस फसल को छिडक कर बो दिया जाता है|
2. हरी फसल को बुआई से 35 से 55 दिन की अवस्था में मिट्टी पलटने वाले हल से 15 से 25 सेंटीमीटर गहराई तक पलट देना चाहिए| अगर आप इसको समय से पहले पलटेगे तो कार्बनिक पदार्थ मिट्टी को प्राप्त नही होंगे और देर से पलटेंगे तो रेशा मजबूत होने से जल्दी गलने सड़ने में समस्या हो सकती है| इसलिए इसको सही समय पर पलटे| अधिक वर्षा या तापमान के साथ यह जल्दी गल सड़ जाती है|
तो इन सब प्रक्रियाओं के द्वारा आप हरी खाद को अधिक पैदावार के लिए और मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए प्रयोग में ला सकते है और यह आप की फसल के लिए भी बेहतर है, कम लागत में इसके द्वारा अधिक मुनाफा लिया जा सकता है|
 5 . जैविक खाडे ( Biotic Manures ) 

जैविक खाद सब्जी की पैदावर अधिक मात्रा में करना आज के समय में अधिक से अधिक लोकप्रिय हो रहा है। इसका एक कारण है, क्योंकि सुपरमार्केट की कीमतें दिन पर दिन बढ़ती रहती हैं। बहुत से लोग जो भी खा रहे हैं, उसकी गुणवत्ता को लेकर भी हमेशा चिंतित रहते हैं। हमने देखा है कि लोग व्यायाम करने और ताजी हवा लेने बाहर जाते हैं, लेकिन व्यायाम करने और ताजी हवा का आनंद लेने के लिए सबसे शानदार तरीका है, कि आप अपने लिए बगीचे में खुद ताजी सब्जियां उगाए। ताजी सब्जियां जैसे:- बैंगन, टमाटर आदि आप जो भी अपने बगीचे से तोड़कर लाते हैं, और उसका एक टुकड़ा काटकर खाते हैं, तो उससे बेहतर स्वाद में कुछ भी नहीं होता है

खाद और उर्वरकों का वर्गीकरण

बाजार में उपलब्ध खाद और उर्वरकों की विविधता को दो व्यापक समूहों में वर्गीकृत किया जाता है
1) प्राकृतिक या जैविक खाद
2) कृत्रिम या रासायनिक उर्वरक।

 प्राकृतिक जैविक खाद

1.  फार्म यार्ड खाद (खेतों की खाद)
2.  कंपोस्ट
3.  ग्रीन खाद (हरी खाद)

 जैव उर्वरक

1.  राइजोबियम
2.  एजोटोबेक्टर
3.  एज़ोस्पिरिलम
4.  नीले-हरे शैवाल
5.  अजोला
6.  मयकोर्रिहिजाए

3. वर्मी-कंपोस्ट 

2. प्राकृतिक जैविक खाद

1. फार्म यार्ड खाद (खेतों की खाद) 

यह गोबर, मूत्र, कूड़े या अन्य सामग्री, मवेशियों द्वारा खाए जाने वाले चारे का हिस्सा और राख जैसे घरेलू कचरे इन सबका मिश्रण होता है। इसे बनाने के लिए घर के पीछे कोने में एक गड्ढे या ढेर में डाल दिया जाता है, और वहां रख कर छोड़ दिया जाता है। जब तक की यह अच्छी तरह से सड़ नहीं जाता है।
जब यह प्रकिया पूरी हो जाती है, तब इसे बाहर निकाल कर खेतों में लागू किया जाता है। अच्छी तरह से सड़े हुए फार्म यार्ड खाद में 0.5% N, 0.2% P2O और 0.5% K2O शामिल होता है।

2. कंपोस्ट खाद

अच्छी तरह से सड़े हुए पौधे और पशु के अवशेष को कंपोस्ट खाद कहा जाता है। खाद का मतलब है, खेतों में प्रयोग होने वाले सड़े हुए पौधे और जानवरों का अवशेष का भाग। कंपोस्टिंग में हवा, नमी, इष्टतम तापमान और नाइट्रोजन की छोटी मात्रा का होना आवश्यक है। यह सूक्ष्म जीवों की एक गतिविधि है, जिसमे सूक्ष्म जीवों को पेश करके सामग्री को विघटित किया जाता हैं। इसके साथ ही उपयुक्त रूप से तैयार इनोकुलम के लिए अतिरिक्त सिफारिशे की जाती हैं।

3. हरी खाद

हरी खाद फसलों को खेतों में या तो शुद्ध फसल के रूप में उगाया जाता है, या मुख्य फसल के साथ दूसरी फसल को उगाकर उसी क्षेत्र में दफनाया दिया जाता है।
सबसे आमतौर प्रयोग होने वाली हरी खाद की फसलें हैं:-, सनई, ढेंचा और ग्वार  इस प्रकिया में कोमल हरी-टहनियों और पत्तियों को बेकार पड़ी हुई भूमि से लेकर एकत्र कर लिया जाता है।
इन सभी को मिट्टी में उसी स्थान पर मिला दिया जाता हैं। झाड़ियाँ और पेड़ को भी काट कर मिट्टी में डाल दिया जाता है, इसमें प्रयोग होने वाली झाड़ियाँ जैसे: ग्लाइरिकिडिया, सेस्बानिया, करंज आदि हैं।

जैव उर्वरक

जैव-उर्वरक में शामिल होते हैं, जैविक नाइट्रोजन फिक्सिंग जीव जो कृषि लाभ मे अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं।
जैव-उर्वरक के लाभ:- i) फसल के पौधों और पेड़ों के विकास में मदद करते हैं ii) बायोमास उत्पादन और अनाज उपज को 10-20 प्रतिशत तक बढ़ाते हैं। iii)  टिकाऊ कृषि में उपयोगी होते हैं। iv) जैविक खेती के लिए उपयुक्त हैं। v) एग्रोटोरेस्ट्री / सिल्वी-पास्ताउरल प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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